पाकिस्तान में जिन्ना के मजार पर दिए गए बयान ने लालकृष्ण आडवाणी को राजनीतिक वनवास दे डाला था...आडवाणी संघ के विचारों के खिलाफ क्या गए, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी। आडवाणी का जिन्ना को सेकुलर बताना भारी पड़ गया।
लेकिन मोदी ने खेला सुरक्षित दांव!
इसके बाद ‘जिन्ना इंडिया-पार्टिशन इंडिपेडेंस’ ने कद्दावर नेता जसवंत सिंह की जड़ें हिला कर रख दीं... जसवंत सिंह भी संघ के विचारों की सीमारेखा से बाहर चले गए...और उन्हें भी इसकी कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन मोदी ने वो गलती नहीं दोहराई...। शायद मोदी को पता था कि उनका ये कदम भगवा ब्रिगेड को नागवार गुजर सकता है। भले ही मोदी ने टोपी से परहेज कर संघवादियों को खुश कर दिया हो, लेकिन टोपी नहीं पहनने के एवज में मोदी को विपक्ष, मीडिया और जनता के सवालों का जवाब देना होगा...। कहते हैं राजनीति में मुर्दे गाड़े नहीं जाते...आज 10 साल बाद भी मोदी गुजरात में हुए दंगे पर जवाब दे रहे हैं...देखना ये होगा कि इस टोपी का जिन्न कब तक मोदी के साथ रहता
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